"आ और टकराए हक़ीक़त से "
By Amit Kumar
में कलम लिए खाली पन्ने पे जज़्बात उतार रहा हूँ
हक़ीक़त से सर टकरा रहा हूँ
खून बह रहा है
इसको स्याही बना लू, बता मुझे
मेरा प्यार, मेरी ज़िद, मेरे ख्वाब उतार दु इसमे
हाथ से कलम आगे नहीं बढ़ रही,
हाथ थाम मेरा, थोड़ी ताकत तू भी दे
में हारना नहीं चाहता इन खाली पन्नो से, इन हक़ीक़त की जंगों से
इनसे भागना नहीं चाहता
थोड़ी हिम्मत जुटा, थोड़ी मुझसे भी बाँट
खाली पन्ने मुझे ताक रहे है, मुझसे जवाब मांग रहे है
पर शायद तेरा इंतज़ार है इनको, शायद तेरी स्याही का खुमार है इनको
अभी स्याही थोड़ी कम है,
आ और टकराए असलियत से, आ और टकराए हक़ीक़त से
By Amit Kumar

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