आ अब घर लौट चलते हैं
- Hashtag Kalakar
- Jan 13, 2025
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Updated: Jul 18, 2025
By Naveen Kumar
आ अब घर लौट चलते हैं
कुछ नहीं बचा इस शहर में
ढूंढ़ते रहे खुशियां मिल सका न एक पल
भटकते ही रह गए मंदिर मजार पर
आ अब गांव लौट चलते हैं
इन रौशनियों की चकाचौंध में
बुझ गए आसमान में चमकते सितारें
मर गई है नदियां सारी
छोड़ गए पंछी भी सारे
आ अब घर लौट चलते हैं
इस बेआबरु हवा में बच सका न कोई
घुट चुकी है हर कली, बिक चुकी है हर गली
मर चुका है हर एक सख्श
हर तरफ हैं बस जिंदा लाशे
कब्र बन गया है पूरा शहर
हर तरफ चलती है ये लाशे
आ अब गांव लौट चलते है
छोटा सा है गांव अपना, छोटे–छोटे सपने होंगे
छोटी होगी खुशियां मगर सब अपने होंगे
इन शहरों के बड़े बड़े सपनों में
फिर से ये घर न तोड़ेंगे
फिर से ये अमिया की डाली फिर से ये पीपल
न छोड़ेंगे
जीवन चाहे जैसा भी हो फिर से ये गांव न छोड़ेंगे
हम फिर से ये गांव न छोड़ेंगे
By Naveen Kumar

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