अहसास
By Monica Banerjee
बड़ा विचित्र सा संबंध है मेरा इस इमारत से
या यूँ कहिये इससे लिपटी इन बेलों से।
एक पल अपनेपन का अहसास कराये
दूसरे ही पल फिर अपरिचित सी लगे।
यह इमारत विशिष्ट है!
यहाँ देश के चुनिन्दा अतिथि आते हैं
चाय की चुसकियों पे, चिकन आला किव पर
130 करोड़ जनता की नब्ज़ टटोलते हैं।
देश की राजनीति इनकी नाड़ी-नक्षत्र में कैद है
देश का हाल-ए-दिल यह खूब जाने हैं
नेपथ्य से तारों को छेड़ना इनका पेशा है
अपने को परम विशिष्टता यह खुद ही देते हैं।
शायद इसीलिये यहाँ की हरी दूब
ऊपर से दिखते हुये सफ़ेद फूलों के गुच्छे
कोयल का मद्धम स्वर
अलसाई शाम को साथ लेकर आती हुयी पवन
अठखेलियाँ करता कबूतरों का जोड़ा
बोगनविलिया की उलझी कतारें
सब खूबसूरत तो बहुत हैं
लेकिन अपनी नहीं लगती।
इनपे भी विशिष्टता का लबादा डाल दिया गया है
छुईमुई हैं, इतनी नाज़ुक कि टूट जायेंगी
पर समझा गयी हैं, अपनेपन और बेगानेपन का अहसास।
By Monica Banerjee

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