अस्तिया
By Jeeshant mathur
रही भोज बनकर मेरी ज़ीस्त पर हमेशा,
एक अरसे के बाद यह रूह काम में आई थी,
मेरे मरजाने की सारी उम्मीदें नाकाम थी,
और मुझे ज़िंदा रखने कि चल रही लड़ाई थी,
तेरे हाथों में कम से कम उसका हाथ तो आता हैं,
मेरे हाथों में तो हर बार आती ही परछाई थी,
न था ढ़ाई आखर लिखने वालो को इल्म ए कियास,
ऐसे तो मिकदार ए मोहब्बत सिर्फ एक चौथाई थी,
आसमान से मक़सद ए मंशा क्या परकटे परिंदों का,
क़फ़स में कैद होकर रह जाने में ही रिहाई थी,
दवा को मैं सरकाता रहा अपने ज़ख्मों से दूर,
इनपर अब ज़हर मलने में ही इनकी भलाई थी
आज जाकर मैं समझा यह तेरा खेल सारा,
तूने दीदा ओ दानिस्ता वोह अंगूठी गिराई थी
इस शहर कि इस गली में ही इतना मातम था
बाकी सब गलियों में आज गूंज रही शहनाई थी
तमाशा ए मोहब्बत तू देख तो सबा,
मेरे मौत के दिन ही तेरी होनी सगाई थी,
सारी उम्र गवा दी हमने फिजूल ही मोहब्बत में
दौलत के नाम पर घरवालों को रख छोड़ी तन्हाई थी,
सुकून से सोए थे उस रात सब घर वाले मेरे
जिस रात मेरी अस्थियां बेच कर सबने रोटी खाई थी
By Jeeshant mathur

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