अश्कों से आमदनी
By Dr Mayuri P Gurjar
पढने की उम्रमें हम लिखने लगे थे,
और इस अनपढ को सब पढने लगे थे।
अश्कों से आमदनी
कांच के टूटे टुकडे समेटे जा सकते है,
दिलके टुकडे गीतोमें बिखरे रहते है,
आमदनी कोई अश्कों से होती नहीं,
इसलिए उस टुकडों पे पलने लगे थे।
पढने की उम्रमें हम लिखने लगे थे,
और इस अनपढ को सब पढने लगे थे।
मोहब्बत तुम्हारी भूलाने में थोडा वक्त दो,
वो प्यार याद करो इतना ना सख्त हो,
इश्क है और फिर नहीं है ये कहने में
तुम्हे भी तो जमाने कितने लगे थे।
पढने की उम्रमें हम लिखने लगे थे,
और इस अनपढ को सब पढने लगे थे।
By Dr Mayuri P Gurjar

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