अलविदा नानी
By Sanket S. Tripathi
नमन तुझको के तुझको क्या कहूँ मैं ,
रूठूँ के मुस्कुरा कर दूँ विदा मैं ,
चली जिस रूप से निह: स्वार्थ होकर इस धरा पर;
करूँ यह प्रार्थना के हु-बहु वैसे चालू मैं |
थी जाने वाली एम्बर को था यह ज्ञात शायद,
तभी रोये थे बादल माघ में जम कर के शायद,
स्वजन तेरे दुखी, जब गिन रही थी साँसे अपनी,
चलती थी साँसे आज, कल होंगी ना शायद |
धरा पर हम तेरे जाने का दुःख मना रहे थे ,
वहाँ ऊपर स्वर्ग में , देवता ढोल नगाड़े बजा रहे थे,
कोई पागल दीवाना पूछता यह उल्लास कैसा !
करुणा का सागर , रूप की देवी आ रही है, यही उत्तर बता रहे थे |
के खुश है देव भी तू स्वर्ग में आने है वाली ,
ख़ुशी अपनी दबा पाती नहीं दुर्गा औ काली,
सजा है स्वर्ग का दरबार आगत के लिए है ,
धरा है पुष्पमाला इंद्रा ने स्वागत के लिए है |
ख़ुशी इतनी ,
के दिन चढ़ते ही यम मिलने को आया,
कहा हे माँ तुझे बंधन रहित करने मैं आया ,
तुझे लेने नहीं मैं भैस पर आया हु अपने ,
प्रभाती से सजी यह देख स्वर्ण रथ हूँ मैं लाया |
उल्लास ईश्वर को, फिर मैं दुःख क्यों मनाऊ,
ख़ुशी का है यह क्षण, दुःख का क्यों बताऊ ,
गिरने ना दिया तूने आँसुओ को मेरे ; अपने जीवन में ,
अपमान होगा गर इनको अब मैं गिराऊ |
नहीं है देह तेरा अब धरा पर तो क्या नया है ,
है कौन वह जो यहाँ से अमर होकर गया है ,
है हर पल साथ मेरे तू तेरे ही साथ हूँ मैं ,
अलौकिक दीप तू मेरे अंदर अब तू रह रहा है |
पर सच है, ननिहाल अब वह नहीं होगा ,
वह आम का पेड़ , खलिहाल का खेल नहीं होगा ,
नहीं होगा वो मेरा तुझसे रूठ जाना माई,
वो पेठा खिला कर मुझे मनाना नहीं होगा |
नमन तुझको तू जीवन का आधार मेरे ,
जहाँ हूँ, खुश हूँ, वजह सत्कर्म तेरे ,
अभी कुछ वक़्त है , पर आऊंगा ज़रूर मिलने मैं तुझको ,
तब तक दे अपना आँचल , अपना आशीष दे मुझको |
तब तक दे अपना आँचल , अपना आशीष दे मुझको |
By Sanket S. Tripathi

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