अरमान
By Dr. Rohan Prabhakar
अब जब बंद ही किये है मैंने-
उजियारों के सारे रास्ते
तय करना ही पड़ेगा सफर
इन अंधियारी पगडंडियों पर …
क्यों है मेरे साथ-
अब भी कुछ चिंगारियां
दिल के किसी गलियारों में
बेबस… सिसकती… लाचार…
वीरान डगर पर
यह सर्द सी हवा
जम सा गया है जिस्म !
थम से गए है हौसले !
बुझे हुए इन कोयलों पर से-
मत हटाओ राख की परतें
जहा आज भी सुलग रही है…
खामोश… अरमानों की ज्वाला…
By Dr. Rohan Prabhakar

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