अमावस की रात
By Anant Srivastav
उस अमावस की रात का इंतज़ार है,
जब चाँद खुद को छुपा लेगा,
और तारे भी थककर
किसी अंधेरे कोने में सो जाएंगे।
वो रात...
जब कोई रौशनी नहीं होगी,
ना बाहर, ना भीतर।
जब हर चीज़ स्याह होगी,
जैसे दुनिया ने अपनी आँखें बंद कर ली हों।
मैं उस रात खुद से मिलना चाहता हूँ,
बिना किसी मुखौटे,
बिना किसी आवाज़ के,
सिर्फ मैं…
और मेरा अंधेरा।
जहाँ कोई उम्मीद न हो,
न कोई शिकायत,
न कोई नाम पुकारे,
न कोई चेहरा ज़हन में उभरे।
उस अमावस की रात में,
जब दुनिया चुप होगी,
मैं अपने भीतर के शोर से मिलूंगा।
और शायद तब…
कुछ टूटे हुए हिस्से फिर से जुड़ जाएँ।
क्योंकि उजालों की भीड़ में
अक्सर अपनी ही परछाईं खो जाती है।
मैं उस रात उसे ढूँढ़ने जाऊँगा,
जो कभी मेरा ही हिस्सा थी…
पर अब अजनबी हो गई है।
हाँ,
मुझे उस अमावस की रात का इंतज़ार है,
जब अंधेरा मेरी रौशनी होगा,
और ख़ामोशी…
मेरी सबसे सच्ची बातचीत का ज़रिया।
By Anant Srivastav

बहुत सुन्दर