अमावस का चांद
By Akanksha Mishra
तुम मुझे अमावस के चाँद से लगते हो
रहता है आसमान में अँधेरा
मगर मेरे अक्स में
तुम जगमगा उठते हो
तुम मुझे,
अमावस के चांद से लगते हो ।
कभी घटता है चाँद,
कभी बढ़ता भी है,
कभी काली रात के पीछे जा छुपता भी है,
मेरी रूह में तुम हर पल पूरे से लगते हो,
तुम मुझे, अमावस के चाँद से लगते हो ।
बस्ते हो क़दर,
मेरे रोम रोम में,
हवा के हर झोंके के साथ,
मुझ में तुम ही महकते हो,
तुम मुझे अमावस के चाँद लगते हो।
रोशन होता है चाँदनी से ये जहाँ,
जब चाँद अपनी रवानी पर होता है है,
पर अमावस को भी,
चांद तो मुक्कम्मल ही होता है,
नहीं होते हो रु-ब-रु,
फिर भी हर एहसास में बसते हो,
तुम मुझे अमावस के चाँद से लगते हो।
By Akanksha Mishra

Love imagination and poetry in these lines.
Amaavas ka chaand....jo hai bhi..aur nahi bhi..
👍👍
So relatable, powerful enough to remind everyone of their own moon
Thoughtful