अब मंजिल की उड़ान लगा
By Amit Kumar
अब तू थोड़ा पागल बन
उनके लिए नहीं अपने लिए बन
पागल की भी पहचान है अब तू अपनी पहचान बन
निशानी खो बैठा है तू अपने वजूद जी अब अपने वजूद निशानी बन
सपनों की सोच तो अपने, ख्वाबों की सोच
रास्ता हर बार नहीं खुलेगा
समय हर बार नहीं बदलेगा
पठार बटोर और रास्ता बना, जाग अब ख्वाबों को हकीकत बना
सोच उस पल की, उन आंखों की नमी की, जो मंजिल के दस्तक पर है
अब गमों को पीठ पर चढ़ा, दर्द को मजबूती बना,
बस अब मंजिल की उड़ान लगा
समय की रफ्तार से चल
पीछा कर सपनों का
अब मंजिल की उड़ान लगा, पसीने को ईंधन बना,
ओ आज़ाद पंछी अब पंख फैला
By Amit Kumar

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