अब नज़र
By Keyur Joshi
अब नज़र नही आता मुझे मुनाफा इस दिल-ए-नादान में,
नीलामी तो तय है, बस इश्तिहार की देर है....
मेरे हजार ख्वाब रौंद दिए जाएंगे अब खुद ही के पैरो तले,
अब बस मयकदे से घर लौटने की देर है...
एक उम्र गुजारी है हमने किसी की राह देखते देखते,
हाँ वह आएंगे जरुर, बस हमारे चले जाने की देर है...
हाँ जी लेंगे हम खुदके लिए भी कभी,
उनके रुख़ से बस निगाहें हटने की देर है...
जवाबों से लैस है हम अपनी खैरीयत के,
उनसे बस हमारा हाल पूछने की देर है...
यहाँ मंज़िलें मिल जाती हैं किसी हमसफ़र की तलाश मे,
जिंदगी है साहब, सफर आगाज़ करने की देर है...
फ़रहत है उसे यूँही मुंतज़िर रहने में,
तुम मत बताना सिफ़र को तुम्हें और कितनी देर है...
By Keyur Joshi

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