अब तो हो सुबह कहीं
By Wamiq Zia
गया है चाँद हार आज
उठा था जब फ़लक़ पे वो
तो रूह सा वो पाक था
रात का चराग़ था
सेहर का वह सुराग़ था
हयात का मेयार था
वो बुझ गया है आज रात
गुम हुआ है बेमुराद
अख़्तरों का था जो यार
था फ़लक़ का शहरयार
बज़्म में था बेक़रार
उसके ख़्वाब तार तार
उसे नज़र लगी कहीं
थी उसकी आरज़ू वहीँ
आएगी जो कल की रात
अजीब होगी वो बिसात
था जो कल तलक निशात
थी जो इक ख़ुशी की बात
वो कहीं ठहर गयी
वो वक़्त सी गुज़र गयी
सितमज़दा थे सब वहाँ
न सब्र का था इक निशाँ
यक़ीं था या के था गुमाँ
बदल गया था फिर समां
वो बुतशिकन यूँ आए थे
सभी सुख़न जलाए थे
तपिश जो थी उस आग में
बदी जो थी मिज़ाज में
वो आब आब चीख़ता
फसा हुआ अज़ाब में
वो आब आब चीख़ता
रुका हुआ सराब में
अब तो हो सुबह कहीं !
गुज़र गए सब हम नशीं
पलक पे है जो कुछ नमीं
मिटा न दे कहीं ज़मीं
अब तो हो सुबह कहीं !
शजर पे एक शाख ए नौ
का मुन्तज़िर है सारा बाग़
ख़ून में अटा हुआ
अभी तलक है हर गुलाब
बुझी क़लम की रौशनी
छुपी चमन की चांदनी
अब तो हो सुबह कहीं !
अब तो हो सुबह कहीं !
By Wamiq Zia

Comments