अपने हिस्से की ज़िन्दगी…
By Nazia Bano
बड़े नादान होते हैं सहारे ढूंढते हैं जो
बिना दरिया में उतरे ही किनारे ढूंढते है जो
सफर है ज़िन्दगी का क्यों कहें आसान गुज़रेगा
बिना एड़ी को रगड़े कब कहीं ज़मज़म भी निकलेगा
समंदर खूब गहरा हो भंवर भी तेज़ हो जितना
अगर मझदार में हम हैं तो कश्ती खेनी पड़ती है
हक़ीक़त कड़वी है फिर भी हमें ये पीनी पड़ती है
सभी को ज़िन्दगी हिस्से की अपनी खुद ही जीनी पड़ती है
By Nazia Bano

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