अपने हिस्से का आसमान
अपने हिस्से का आसमान ले आयी थी मैं चुराकर आपके आंगन से पापा और अपने नए घर में एक अच्छा सा कोना देखकर टांग दिया था कि कभी जब फुर्सत होगी तो इस आसमां की खिड़की खोलूंगी और बारिश से मिल लूंगी फिर जब इन्द्रधनुष निकलेगा तो उसके रंग डब्बों में भरकर अपना घर रंगूंगी। समय के साथ उस कोने में टंगने लगी ज़िम्मेदारियां कुछ होने की, कुछ बनने की, कुछ बनाने की कुछ दूसरों की अपेक्षाएं कुछ खुद की महत्वाकांक्षाएं कुछ उम्मीदें, कुछ सपने कुछ नए रिश्तों की डोर कुछ पुराने रिश्तों के उतारे केचुले कुछ सवाल और उनके जवाब में कुछ और सवाल उन सबके बीच मेरा वो आसमान कहीं दब गया। कई बार उस आसमान को निकालने की कोशिश की लेकिन निकालने की कोशिश में वो और उलझ जाता । एक दिन इस कोने की कील ने दम तोड़ दिया तो धप से उस कोने में टंगी सारी चीज़ें जमीन पर गिर पड़ी। अपने आसमान को उस ढेर से निकाला सालों की जमी धूल को झाड़ा, पोंछा, साफ किया ज़ंग लगी खिड़की के कोनो पर छीटों कें निशान थे जैसे बारिश होकर सूख गई हो बड़ी मुश्किल से खिड़की खोली तो देखा इन्द्रधनुष के रंग उल्टे पलटे बिखरे पड़े थे मेरे इंतज़ार में सूख गए थे, पपड़ी जम गई थी डब्बों के भीतर अब ये रंग बेकार थे, इनसे घर नहीं रंगा जा सकता था सो मैंने उन डब्बों में जमी रंगों की पपड़ी निकाली, उनका चूरा बनाया और अपने कमरे में रखे एक छोटे से गमले में डाल दिया अब हर रोज़ उस गमले में मेरे हिस्से का आसमां उगता है इंद्रधनुषी रंगों वाला|
By Nilima Monica Purti

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