अपनापन
Updated: Jul 25, 2025
By Ritvik Sharma
अब कौन इन बिखरे हुए टुकड़ों को लाएगा
अब कौन इस मासूम से दिल को वापस समझेगा
ये जो गहरी सी छा गई है मुझमें
अब कौन इसे वापस भर पाएगा
पुरानी यादें सोच
रात-रात दिल खूब रो लिया
पता नहीं केस कब
मैने खुदको खुदसे खो दिया
वक़्त के साथ, हालत भी अनदेखे बदल गये
कि अब सच भी सपना सा है लगता
दिल खूब हंसता है औरो के साथ
पर अब कोई अपना सा नहीं लगता।
By Ritvik Sharma

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