अपना बनाते हैं
By Suman Rai
अपना बनाते हैं
चलो अब एक नया नारा बनाते है,
बेटियों को पराया नहीं, अपना बनाते हैं।
झूम उठेगी प्रकृति की सारी कायनात,
जब समझ में आएगी यह उत्कृष्ट बात,
ऊँची परवरिश कर, सर्वगुण सम्पन्न बनाते है,
बेटियों को पराया नहीं, अपना बनाते हैं।
ज्ञान की गरिमा से, नारी जब सक्षम बनेगी,
चेतना के सौंदर्य से, आत्म-सुधार भी करेगी,
शुरुआत अपने घर से कर, सुदृढ़ समाज बनाते है,
बेटियों को पराया नहीं, अपना बनाते हैं।
कोई भी कुप्रथा पनपती है अज्ञान से,
परिवर्तन भी अपरिहार्य है, खोखले समाज में,
‘बेटों’ को भी परायी चीज़ का विकल्प बनाते हैं,
बेटियों को पराया नहीं, अपना बनाते हैं।
बेटी जब सीढ़ी बगैर ऊँचाइयों को छू लेंगी,
आत्मनिर्भरता से स्वयं को सुसज्जित कर देगी,
आश्वस्ति भरे भाव से सपना सजाते हैं,
बेटियों को पराया नहीं, अपना बनाते हैं,
चलो एक नया नारा बनाते हैं॥
By Suman Rai

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