अनूठी दौड़
By Navneet Gill (नवनीत गिल)
है अनूठी,
सच्ची थोड़ी झूठी,
"प्रतिस्पर्धा" की दौड़,
नहीं देखे जीवन के मोड़।
तभी गिरे,
एक सिरे से दूसरे,
रहती भागती हरदम,
बग़ैर पिये ही देखो मय।
करे छल,
हरदम हरेक पल,
होड़ से चपत खाकर,
गिरते औंधे मुंह जाकर।
वक्त रहते,
काश संभल लेते,
रोये गिड़गिड़ाये बाद,
जब सबकुछ था बर्बाद।
है ज़रूरी,
मगर करके तैयारी,
कूदना, सदा इस मैदान,
होगा नहीं कभी अपमान।
By Navneet Gill (नवनीत गिल)

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