अनजान शहर
By Dr. Devendra K Prajapati
एक सी नक्काशी है मीनारों में, एक से औहदें हैं
अनजान है शहर मगर,
अनजान लगता भी नहीं।
एक सी मिल्कियत है कर्मों की,
एक से कारखाने है,
कुछ मेरा सा लगता है मगर,
मेरा कुछ भी नही।
अनजान है शहर मगर,
अनजान लगता भी नहीं।
एक से फूल हैं गुलिस्तां में एक से बाग है.,
इकरंगी सा है हर फूल मगर,
रंग भी खुद एकरंगी नही,
अनजान है शहर मगर,
अनजान लगता भी नहीं।
By Dr. Devendra K Prajapati

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