अधूरे वादे
By Dhara Prajapati
ना चाहा मैंने तुम्हारा रूप,
बस माँगा तोह सिर्फ तुम्हारा साथ,
पर वोह तक हमारे नसीब न हुआ।
आज दिन के आखिर में, आसमान को देखकर
याद करती हूँ वोह सार्व हसीं पल, उन् लम्हों को फिरसे जी लेती हूँ
न जाने क्यों, अब सिर्फ यह तारे समाज पाते है मुझे,
यह काली राति की चादर ओढ़कर में कुछ पल का सुकून ढूंढ लेती हूँ,
आखिर हर किसी का इश्क़ मुकम्मल क्यों नहीं होता?
क्यों नहीं होते ज़िदगी भर निभाने के वाडे पुरे?
By Dhara Prajapati

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