अधूरा?
By Pragati Yadav
नयन नयन कह गए
तेरे अश्रु जो,
ना जाने किस धुन पर चले हैं वो।
ठहरे हैं पत्ते ठहरी हवा,
संग चलते है बीते जहां।
बड़ी मुद्दत से
उसके जहां का ज़िक्र आता ही रहा है।
समेटे उस हवा को,
या बस बिखर जाना काफी है?
अगर उस ओर मुड़ चली ही है ये मिट्टी,
तो एक सवाल तो बनता है।
शोर करें, या ठहर जाएं?
अधूरे होने का इल्म करें, या बस अधूरा होना भी काफी है?
मुड़ चलें, या बस इसी कदम थम जाए
हर धुन बताती है, ठहरे तो हैं ही बिखरे भी
हर बार कहती है हवा, और तेरी ओर जाती तमाम राहें
इस जहां या उस जहां,
तुम्हारा महज़ होना ही काफी है।।
By Pragati Yadav

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