अधर्म का महाकुंभ
By Shiva Verma
हो रहा आज जो अधर्म सा, वही सुनाने वाला हूं,
है छिपा हुआ जो अधर्म है, प्रतिबिंब बनाने वाला हूं,
कुंभ का मेला बड़ा भव्य है, रचना करने वाला हूं,
आते - जाते, उठते - बैठे, सब कुंभ की महिमा गाते हैं,
नाशिक, उज्जैन, हरिद्वार, प्रयाग, ही कुंभ तीर्थ कहलाते हैं,
होता क्यों महाकुंभ यहां ही, महिमा आज सुनाता हूं,
एक कहानी कदरू की दूसरी समुद्र मंथन की है,
दोनों में समान बात, अमृत बूंद वहां गिरने की है,
अमर बूंद, के अमर स्नान, में पाप को धूल ही लेते हैं,
इसी लालसा को लेकर, हिंदुत्व आज उमड़ते हैं,
कई आस्था से आते, कई कंटेंट बनाते हैं,
कोई करता स्नान यहां, कोई आईटी बाबा ढूंढ रहा,
कोई मोनालिसा पर पागल है, कोई मीम है बना रहा,
कलयुग भी भ्रम है की, ये सोचा तो मैंने भी ना,
ऐसा प्राणी, जो दरिद्र सा आज धरा पर है ,जन्मा l
आगे की कुंभ महिमा, जो तुम्हे बताने वाला हूं,
भगदड़ में धसी लाश की चीख सुनाने वाला हूं,
है छिपा हुआ जो अधर्म है, प्रतिबिंब बनाने वाला हूं,
भीड़ों के सैलाब को क्या, सोते श्रद्धालू नहीं दिखे,
उन्हीं की है ये गलती जो, श्रद्धालू जिंदा नहीं बचे,
ये स्वर मेरे यहां नहीं, रिपोर्टर वहां पर बोल रहे थे,
व्यूज की आड़ में जो पहले, आईटी बाबा को दिखा रहे थे ,
अगर देश के चौथे स्तंभ का थोड़ा फर्ज अदा करते,
करते बात व्यवस्था पर कुछ त्रुटियां वहां गिना देते,
शायद परिवार आज वो भी कीचड़ में धंसे नहीं होते,
धंसी लाश की जगहों पर शायद कमल खिले होते,
कोई बुजुर्ग था धंसा वहां, कोई अभी भी बच्चा था,
कोई था बलवान देह से, कोई देह से कच्चा था,
कइयों के बेटी - बेटा वो, कइयों के नाती पोता वो,
कइयों साड़ी धंसी वहां कइयों के चप्पल सूट बूट,
देख परिवार इस मंजर को, रो रहे थे छाती कूट कूट,
आखिरी सवाल बस इतना है, लाग किसका कितना है
क्या लाग यहां पर उनका है जो कुंभ नहाने आए थे,
या लाग यहां पर उनका है, जो धर्म बचाने आए थे,
अब इस भगदड़ को लेकर भी कई कहानी आएंगी,
कुछ पैसों के मोल तोल में वहीं धंसी रह जाएंगी,
हो रहा आज जो अधर्म है, मैं सही नहीं कर पाऊंगा l
प्रतिबिंब बनाना काम था मेरा, प्रतिबिंब बना के जाऊंगा l
आखिर में चार ओर लाइन जो संबंधित हैं इसी पाठ्यक्रम से,
थी आपात स्थिति, ये प्रशासन बता गया,
लाशों के बदले मुआवजा दिया गया,
एक बाप का औदा, क्या करे इस रकम का,
जिसका धनी सा जवां लड़का मर गया l
By Shiva Verma

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