अघुवाई
By Arpita Yadav
एक रोज सी भोर हुई,
हर रोज़ सी अंगड़ाई ली,
अखबार उठाया, चाय उठाई,
खबर पढ़ी अघुवाई की।
काले गाढ़े अक्षर और पन्ना पहला,
पहले पुचकारा फिर दबोच लिया,
उस नन्हीं-सी बच्ची को सहला।
आँखें झुकी तो खबर बढ़ी,
थी वो दोपहरी की मध्य-घड़ी,
सब अनजानों में वो एक था कुछ जाना,
खिलखिलाकर तभी उस फूल ने पहचाना।
उस भीड़ की घबराहट में,
एक गैर की अपनाहट में,
ज्यों ही कुछ डग बढ़ा,
एक हाथ ने कसकर जड़ा।
फूल दबोचे बलिष्ठ कद ,
प्रत्यक्ष भीड़ से होकर,
डोल रहे थे षट- फुट के कद ,
खुले नेत्र से सोकर।
चोरी हुई फूल की क्योंकि,
सारा जंगल निष्प्राण था,
रखवाले थे मस्त कहीं,
गुफाओं में उनका आशियान था।
प्राणहीन को प्राणी कहकर,
गंदी जबां को वाणी कहकर,
किस मन की कीरथ गायेंगे,
कब तक ये सिर्फ जिंदा नज़र आने वाले “जिंदगियाँ” कहलाएंगे।।
By Arpita Yadav

Awesome
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Magnificent 🤌
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Such a beautiful poem