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अगर‌ इंसान सच‌ में इंसान होता

By Aditya Nandkumar Garde


अगर इंसान सच में इंसान होता,

तो हर चेहरे पर विश्वास लिखा होता। 

नफरत की जगह दोस्ती का उजाला,

हर जुबान पर मोहब्बत का गीत होता। 


अगर इंसान सच में इंसान होता,

तो भूख सड़क पर ठंडी न मरती। 

रोटियां बची हुई कूड़ेदानों में नहीं,

हर पेट की आग बुझाने में लगती। 


अगर इंसान सच में इंसान होता,

तो मंदिर मस्जिद की दीवार सरकार बना न पाती। 

हर प्रार्थना इंसानियत के नाम होती

हर ईश्वर इंसान की आँखों में मिलता। 




अगर इंसान सच में इंसान होता,

तो धरती को काट कर जख्म ना दिए जाते। 

जंगलों को राख ना बनाया जाता,

नदिया आंसूओं में डूबी न होती। 


अगर इंसान सच में इंसान होता,

तो औरत को वस्तु समझा न जाता। 

स्त्री की आँखों में सिर्फ सम्मान झलकता,

उसके आंचल में पूरा आकाश बसता। 


अगर इंसान सच में इंसान होता,

तो समाज अंधकार का कैदी न होता। 

हर घर एक दीप जलता,

हर इंसान उसकी ज्योत बनता। 


अगर इंसान सच में इंसान होता,

तो मौत का डर, जिंदगी के हिम्मत से छोटा लगता। 

क्योंकि ये जिंदगी का असल अर्थ,

उसकी मोहब्बत और इंसानियत से तय होता। 


अगर इंसान सच में इंसान होता,

तो ये धरती स्वर्ग से कम ना होती। 

भगवान ने दिया हुआ धरती को स्वर्ग बनाने का मौका,

इंसान इस तरह न गंवाता। 


अगर इंसान सच में इंसान होता,

तो अन्याय का नामोनिशान मिट जाता। 

जहाँ आज आंसू गिरकर सूख रहे हैं,

वहाँ हँसी की बारिश होती। 


अगर इंसान सच में इंसान होता,

तो समाज सिर्फ भीड़ नहीं। 

बल्कि एक जागता इंसान होता,

जैसे वो इंसानियत का आईना होता। 


मगर आज,

कितनी गहरी काली रात फैली है,

जहाँ रौशनी के लिए हमें इंसानियत को, जलाना पड़ रहा है। 


By Aditya Nandkumar Garde



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