अखिरी अल्विदा
By Nupur Jain
एक अखिरी अल्विदा कहना था तुम्हे
माथे को चुम कर, बाहों में कसकर
फिर पलट जाती मैं
तकलीफ तब भी उतनी ही होती
पर ऐसे तो रुठ के ना जाती मैं
एक अखिरी बार तो हक़ से तुम्हे, सिने से लगाती मैं ।
अधर थे खामोश मेरे
मैं भी शांत खड़ी रही, तुम्हे जाता देख
पता जो ना था कि वो मुलाक़ात हैं अखिरी
मेहज़ घर जा रहे हैं लगा था, जब चाहे मिल लिया करेगें
तब के रुख्सत आज तक खफ़ा है ।
दुरी के साथ दुरियाँ बढ़ चली
इतना मुश्किल हुआ समझना,
कि लगा आसान भुलना तुम्हे
कैसी थी ये तकरार ना अहंकार झुका, ना हारी मोहब्बत
बिखर गये दो दिल इस मन-मुटाव में ।
भुलाना था जिन्हे भूल को, वो हमें भुला बैठे
और,
इस तरफ़ कोशिश में उन्हे भुलाने कि, हम खुदको भुला बैठे
शायद किसी मोड़ पर टकरा जायें हम,
काश़ तब फिर वो भुल सुधार ले हम
इस बार होठ सिये ना रह जायें मेरे
ना तुम्हारी नज़र मुझसे फिरे ।
फिर एक बार ऑटो ओझल होने तक मेरी नज़रे ढूंढे तुम्हे
रह जायें भले ही अल्फ़ाज़ अधुरे
पर इन आँखों को कोई शिकायत ना हो
तुमसे मेरा अखिरी अल्विदा किसी रोज़ तो पुरा हो ।
उस दिन के इंतेज़ार में रह-रह कर तुम्हारी याद आएगी
सुबह होते-होते तुम्हे भुलने की कोशिश फिर अधुरी रह जाएगी
शायद ठीक से अल्विदा ले लु तुमसे
उस रात मीरा को चैन की निंद आए।
जो थी ना मंजुर जुदाई
अब स्वीकार कर चली हूँ
किस्मत से हारी, पर ज़िन्दगी में आगे बढ़ चली हूँ मैं
पर आज भी वो अधुरी मुलाक़ात
पुरी करने के ख्याल, ना भूल सकी मैं
एक अखिरी अल्विदा कहने की हसरत ना छोड़ सकी मैं ।
By Nupur Jain

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