अखंड राष्ट्र
By धनंजय प्रताप शर्मा
भूमंडल के मद्यासन में
शोभित, वीर, वसुधा की थाथी,
घोर तिमिर में अटल ऊष्मा,
दीपित, हर्षित, उर्वर, मदमाती,
कोटि-कोटि संतति कि जननी
कुरुक्षेत्र रण कि महतारी,
गागर में सागर को भर ले
भारत कि ऐसी माटी हमारी,
दाएं हाथ में पंच सरिता
बाएं मेघ वर्षावन हो,
शिखर मुकुट भाल पर दमके
पग बैठे दक्षिण सागर हो,
उस सम्मानित माटी को
अब अपमानों ने घेरा है,
अब भारत के हिम शिखरों पर
शैतानों का डेरा है,
उन शत्रु से, शैतानों से
अब अपमानो का तोल करें,
अखंड राष्ट्र कि ओर बढ़े।
कब तक माधव शिशुपाल के
अपशब्दों का भारण झेलेंगे,
कब तक रघुबर जलधि तट पर
संयम का अर्पण दे लेंगे,
घोर तमस में अग्निवंश भी
गौण रहेगा कब तक,
उत्पीड़न के घावों से अब
रक्त बहेगा कब तक,
कब तक मिथ्या सीमाओं के
बंधन में रहना होगा,
कब तक सैनिक के शव को
यूं कांधे पर सहना होगा,
अब पीड़ा की वीणा से
वो राग मेघ मल्हार उठेगी,
लाहौर, कराची, गिलगित से
वो तीन रंग ललकार उठेगी,
शत स्वर्णकार के दंशो पर
अब लोहारों का वार करें,
अखंड राष्ट्र की ओर बढ़ें।
उस भारत को साध रहे
जिसने अधीनता लांग दिया,
उस माटी को बांध रहे
जिसने अनंत को दान दिया,
सूर्य प्रभा को साधेंगे
क्या ये जेहादी नारे,
अमर वेघ में झुक जाते
वो भीख मिले हथियारे,
रोज-रोज सीमा पर गोली,
मुठ्ठी भर आतंकी टोली,
मुठभेड़ों का नया झरोखा,
समझौतों से होता धोखा,
युग-युग, अणु-अणु, कण-कण,
पग-पग शोणित तर्पण,
धीर-धरा, गंभीर खड़ा
सैनिक का राष्ट्र को अर्पण,
मन ज्वाला को साथ लिए
अब अतिक्रमण झंझोर चले,
अखंड राष्ट्र कि ओर बढ़े।
By धनंजय प्रताप शर्मा

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