अख़बार
By Kshitij Kawatra
अख़बार की माने तो जीना हराम
लपटों में सुलगती ये दुनिया तमाम
आज यहाँ तो कल वहाँ के मसाइल
तशवीश में जाने करें कैसे आराम
गर मर चुका इस जहां से ख़ुदा
तो लेता क्यों कोई ख़ुदा का नाम
हर चीज़ की क़ीमत मिलेगी यहाँ
जज़्बात का भला यहाँ क्या काम
डराना, हँसाना, आँखें भर आना
झूठ है सब, ये ढोंग का धाम
ये बनाए बादशाह और गिराए बादशाह
रूजहान वहीं जहां मिले ऊँचा दाम
इतिहास गवाह है, अम्न फैला है
बे-अम्न हर दिल गिनवाएँ आलाम
टीवी से परे, फ़ोन से कहीं दूर
बे-चैन मन को शायद मिले आराम
By Kshitij Kawatra

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