अकेला (Akela)
Updated: Jul 18, 2025
By Sameer Agarwal
कभी उड़ता था ये झुंड के साथ आकाश में,
आज झिलमिलाते आसमान में पंछी अकेला है।
आजा ओ माझी तू तूफान से निकलकर,
कि तेरी कश्ती के बगैर किनारा अकेला है।
पतझड़ का मौसम तो गुजर गया यारों,
आज बहारों के अंजुमन में एक फूल अकेला है।
तमाशबीनों से निकलकर हमने देखा है,
रंगमंच के बाहर हर किरदार अकेला है।
हम अपना ही दुखड़ा रोते रहे यहां पर,
समझे तो जाना यहां हर कोई अकेला है।
जो बजते रहे घंटे तो दरबार लगा करते हैं,
जो बंद हो अगर मंदिर तो खुदा अकेला है।
By Sameer Agarwal

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