अंधेरा:
By Anurag Bajpai
अंधेरा...
तुम सिर्फ बोल सकते हो!
अंधेरा...
तुम सिर्फ लिख सकते हो!
अंधेरा...
तुम सिर्फ सोच सकते हो!
आंखें मूंदकर के तुम अंधेरा देखते होगे।
मगर मैं देखता हूँ अंधेरा खोलकर आंखें।
तुम्हारे पास कई किरदार हैं, शक्लें हैं, बहाने हैं...
बहाने हैं कई रंगों के, जो पीले, कभी नीले, कभी काले भी होते हैं...
मेरे पास जो है, वो बस इक किरदार है मेरा।
की जिसकी शक्ल भी मुमकिन नहीं कि देख पाऊं मैं।
मेरे सारे बहाने सिर्फ काले और सादे हैं...
ये सादापन भी मैने सिर्फ सुन रख्खा है, तो बोला...
तुम्हारे सादेपन की भी कोई सूरत तो होगी ही?
नहीं तो कोई रंग उसको भी तुमने दे दिया होगा,
वो शायद और काला हो के या फिर कुछ सलेटी सा!
मगर क्या जानते हो तुम? मुझे सपने नहीं आते!
मुझे मालुम नहीं होता कि दिन कैसे गुजरता है...
तुम्ही तो थे वो जिसने कल बताया था कि तारीखें बदलती हैं!
या शायद झूठ है सबकुछ.... ये तारीखें....ये दिन होना....
गुजरना और गुज़रकर शाम हो जाना....
के सच केवल अंधेरा है!!
है जिसका रंग न जाने क्या?? मगर मुझको....
किसी आवाज़ ने बोला था बचपन मे..
अंधेरा होता है "सफेद"
By Anurag Bajpai

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