अंतिम उपहार
By Pragya
प्रिय क्या तुम दोगें
अंतिम उपहार मुझे,
इस रिक्त संबंध की
पूरित याद मुझे ।
मौन क्षणों में भी
बने मेरी बोलनी,
चाँद-सूरज से सजी
एक सुंदर ओढ़नी ।
बुनी रेशमी धागों से
कुछ ज़रदारी गाँठों से,
टाँकी झिलमिल तारों से
रंग-बिरंगे धारों से ।
बीते क्षण दोहराने को
पुनः अनुभूति पाने को,
माँगा अंतिम उपहार प्रिय
प्रीत की सुर्ख़ छाप प्रिय ।
छाए प्रेम स्मृति जब
लपेट लूँगी तन को,
घुटनों पर शीश झुकाए
समेट लूँगी मन को ।
आशीष सजा हो शीश पर
स्कंध पर गरिमा ठहरे,
कांति बन काया घेरे
कटिभाग पर पंख लहरे ।
शीश स्कंध काया कटि को
प्रत्यय सज्जित करेगा,
ह्रदय की विकलता
सुर्ख़ श्रृंगार हरेगा ।
आभार सदैव तुम्हारा
अनुनय अपनाने को,
छाप स्वरुप उपहार में
लाल ओढ़नी लाने को ।
अंत में मैंने ओढ़ा
अंतिम उपहार तुम्हारा,
मुक्त हुई मैं तन से
अमर प्रेम हमारा ।
आरंभ अन्तिम यात्रा
ना कोई साथ चलेगा,
बस मेरी देह संग
तेराउपहारजलेगा।
By Pragya

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