अंतर्मन के किनारे दफ़न अशुद्धता
- Hashtag Kalakar
- Nov 29, 2025
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By Vansh Sahni
असीम समुद्र के अंत में एक छोटा सा किनारा था, जो कि दो दिलों के मिलने का रोज़ का सहारा था। किनारे की सफाई तो बस एक बहाना था, असली राज़ तो उन समुद्री सीपो में समाया था, जो कि चाँदनी रात की रोशनी में लहरों के कारण किनारे की सतह पर आया था। परंतु प्रातः तक लहरों की तरह वह भी अपने साथ राज़ और उससे जुड़ी अशुद्धता अपने साथ लेकर किनारे में समाया था।
अक्सर जिंदगी भी कुछ ऐसे ही किनारे और समुद्र सीपों की तरह है जो कि सबके लिए हर्षोल्लास का प्रतीक है, परंतु उस पर चलते हुए किये कुकर्म कचरे की तरह जम जाते हैं, जिसे कुछ हद तक लहर रूपी आँसू साफ तो कर देते हैं, पर कुछ जख्म और शिकवे रात के अँधेरे में बाहर आते हैं परन्तु जिंदगी तो आगे बढ़ने की नाव है इसलिए, प्रातः तक वापस अंतर्मन रूपी सीपों की तरह वे भी दफ़न रह जाते हैं, जिसे चाह कर भी किनारे रूपी जिंदगी से निकालना लगभग असंभव हो जाता है।
समुद्र किनारे पहुँचा था मैं, करने अपने किनारे की सफाई। वहाँ एकतक समुद्र की असीमता निहारते हुए, और तेज़ हवा के प्रभाव से मेरी आँखें भर आईं, और गम की लहरें बहने लगी । कहने को तो सिर्फ आँसू थे, पर सिर्फ मुझे और मेरे किनारे को उस लहर के प्रभाव के बारे में पता था। उस माहौल में हौले से एक महक आई जो मुझे बहुत लुभाई। जब-जब वह महक आई, लहरें थोड़ी ठहराई।
उस महक ने खुद-ब-खुद मेरे पैरों के लिए राह बनाई, जिस पर चलते हुए वर्षा आई और बिजली थरथराई। उस रोशनी के कारण मुझे वे महक के पीछे की रातकली दिखी। जिसे देख मेरे दो बंदर जैसे कानों को लहरों से ज्यादा हृदय की धक-धकी सुनाई पड़ी। उसकी चाँदनी में चमकती आँखें देख मुझ में चकोर सी आस जाग आई। उसके करीब जाकर कह तो कुछ ना पाया, पर उस चुप्पी में इतना कुछ था जो कि शब्द या कोई भी स्वर आज तक कह न पाए। सिलसिला ये चलता रहा और कई रात जब तक आखिरकार बनने लगी थोड़ी सी बात। बनाकर प्रेम की ये एक नैया, पार करने लगे हम जीवन की हर एक दरिया।
पर एक दिन, आई एक विशाल नाव जो लाई थी एक तूफान साथ। उस तूफान की आंधी में बह गई हमारी नाव और दे गई मुझे जिंदगी भर का घाव। छोड़ गई थी वह मुझे बीच समंदर बेसहारा, फिर भी उसके आने की उम्मीद में इंतज़ार करता रह गया यह दिल बेचारा। बना लिया था इसी आशा को जीने का सहारा। बीत गए कई नगमें और दौर, और पहुँचा मैं जीवन के अंतिम पड़ाव। दिख रहा था मुझे वह आखिरी किनारा जो अभी तक था उस गंदगी का मारा, जिसे साफ कर रहा था वे जल जो कि मूल से था खारा। उसे देखते-देखते बन गया मैं, उस असीम समुद्र की लहरों को रोशनी देने वाला एक छोटा सा चमकता तारा।
By Vansh Sahni

Elegantly Expressed
So thoughtful!
Soo wholesome
A truly touching poem. The emotions are raw, genuine, and beautifully expressed. Well written!
Thoughtfully Wriiten ✨