अंतर्मन की यात्रा (मैं और मेरी कलम)
Updated: Jul 18, 2025
By Harsha Pungliya
एक दस्तक, मुझे अपनी और ले जा रही है,
जहाँ कोई नहीं है, मैं और मेरी कलम,
वो कलम, जो कहती है, सच लिखूंगी,
वाकिफ खुद से कराती है,
झूठे को झूठ झूठा कहती है,
और खुद से मुझे हर दिन मुलाकात कराती है..
मैं खोही हूँ, इस अंधेरी नगरी में,
मुझे जागती है, और कहती है,
मेरा साथ, तेरे बाद भी है,
मैं ज़िंदा करती हूँ, हर कलाकार को,
मुझसे शब्दों को पिरोया जाता है,
और मैं कलाकार को रचती हूँ..
तूफान की आहटों में,
एक आवाज़ सुनाई देती है,
ये आवाज, अंतर्मन की है,
अधूरे सपनों की ये,
जो बुनते रहते हैं, ये मन..
यह आवाज, उन आंसुओं की है,
उन तड़प, और चीखों की है,
जो सन्नाटे में भी चीखते हैं,
ये आवाज, मेरी और मेरी कलम की है,
जो कह रहे हैं खामोश हो जा,
दो पहर के लिए ठहर जा..
मुस्कान भरी निगाहों से,
एक आवाज, अंतर्मन की आवाज,
मैं और मेरी कलम..
By Harsha Pungliya

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