अंतर्नाद
By Dr. Rohan Prabhakar
यह नाद जो...
शून्य से होकर उत्पन्न
ब्रम्हांड व्यापकर
फिर शून्य में लुप्त हो जाये
प्रतिक्षण मिट कर भी
तरंगों से उभरकर
अखंड दीप्त हो जाये
ध्वनियोंकी तालमेल
सृष्टि की मग्न झंकार
मुझ ही को प्राप्त हो जाये
... है मेरा ही अंतर्नाद !
By Dr. Rohan Prabhakar

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