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अंकुर की गहरी दोस्ती

By Prince Gautam




खिला-खिला सा धुप था मगर, कुछ गहरे सफ़ेद बादल उसे छेकने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। हरे भरे खेतो में बहता मदमस्त हवा, फसलो को मनचला लहरा रहे थे। पास में ही एक नहर थी जिसमे बहते कल-कल पानी को एक शरारती नंगे पैर का जोड़ा परेशान कर रहा था।

कंधे में नीला बैग लटकाए, हाथो में जूते थाम, नहर के छिछले पानी वाले हिस्से में अंकुर कभी आगे की और छप-छप करता जाता तो कभी पीछे की और छप-छप करता आता, या फिर कभी जोर-जोर की छलांगे लगता।




यूँ तो उसका स्कूल 7 बजे से सुरु हो चूका है, पर हर बार की तरह आज भी वह स्कूल नहीं गया।

6 साल का बच्चा और उसकी यह छोटी सी नादानी; इन कारेस्तानियो की खबर न घरवालो को है, और न ही स्कूल वालो को। इसकी खबर तो बस बांके को है।

बांके, 8 साल का सांवला लड़का जो पास के गाँव से है। वह अक्सर इस नहर के पास वाले पीपल के पेड़ के आस-पास अपने बकरिया चराता है। एकदम दुबला-पतला, फटी पतलून और कंधे में गमछा लटकाए वह जब भी अंकुर के नजरो में आता तब अंकुर फटाफट उसके पास पहुँच जाता है। पूरी दोपहर गप्पो-शाप्पो में कट जाती है। सूरज ढहलने से पहले अंकुर निकल जाता है और सूरज सूरज ढलने तक वह घर में प्रस्थान कर देता है।

यह सिलसिला अभी का नहीं है। करीब एक-डेढ़ महीनो से ऐसा ही चल रहा है। छह साल की कच्ची उम्र; तब कहा किसी को सही-गलत का पता होता है। अंकुर को बांके के रूप में एक दोस्त मिल गया था, और यह उसके लिए काफी था।

“हमारी दोस्ती इतनी गहरी है की अब हम हमेशा के लिए एक हो चुके है।“ अक्सर बांके मुस्कुराकर यह बात अंकुर से कहता और अंकुर भी बदले में हलकी सी मुस्कान चेहरे पर सजा देता। सचमे, वे बड़े गहरे दोस्त बन चुके थे। कमसेकम अंकुर को तो ऐसा महसूस होता था।

मनुष्य एक सामाजिक पसु है। हमे वक़्त-बेवक्त किसी साथी की जरुरत पड़ती है। ऐसा हम जाने-अनजाने, बड़े कच्चे उम्र से करने लगते है।

अंकुर बड़े सताए हुए बच्चो में एक था। वह जो शांत और खुद में कैद रहते है; अंकुर बिलकुल वैसा ही था। उसके चुप्पी का उसके स्कूल के साथियो ने कई बार फायेदा उठाया है। कभी टिफ़िन छीन लेना, कभी उससे उसकी पेंसिल छीन लेना, अगर उसने होम वर्क नहीं किया तो टीचर को बता देना, वगेरा। वे अंकुर को परेशान करते, उसपर हस्ते, जब अंकुर रोने लगता तो वे उसे खूब चिढाते।

घर में भी अंकुर को कोई नहीं समझता था। अंकुर की माँ बीमार रहती थी, और अंकुर के पिता हमेसा बाहर रहते थे। अंकुर की एक बड़ी बहन थी जो माँ के बिगड़ते हालत से परेशान थी। अंकुर को अक्सर लगता था जैसे उसकी बड़ी बहन ने माँ की जगह ले ली हो। दैनिक कार्य जैसे बर्तन धोना, कपडा धोना, खाना पकाना, घर की सफाई, अंकुर का होम वर्क में मदद, सब वह कर देती थी। और बस, यही था अंकुर का छोटा सा परिवार।

एक समय की बात है, जब अंकुर की एक नानी भी थी। तब उसकी दीदी हॉस्टल में रहती थी। अंकुर और उसकी नानी में बहुत गहरी दोस्ती थी। अंकुर अपनी हर आप बीती, अपने नानी को रोज सुनाता था। उसकी नानी भी धेर्य के साथ, मुस्काते हुए, अंकुर की हर बात सुनती थी। कुछ चार महीने पहले ही, अंकुर की नानी का निधन हो गया। तब दीदी को हॉस्टल से छुड़ा कर घर लाया गया ताकि वह माँ की तबियत का ख़याल रखे। नानी के काम घर, माँ की बिगड़ते हालत और दीदी के कष्ट में जैसे अंकुर को भूल ही गए। अंकुर का उसके नानी के साथ जो गहरी दोस्ती थी, वह भूल गए, अंकुर को नानी के साथ कितना अच्छा लगता था, वह भूल गए, वह भूल गए अंकुर की शरारते, जो वह नानी को हसाने के लिए करता था, अंकुर की मायूशी, उसकी भावना और अंकुर की ख़ुशी, सब भूल गए।

बांके का साथ अंकुर को उसे उसकी नानी का साथ की याद दिलाता था। जब वह बांके को अपना दिन चर्य कहता तो उसे लगता जैसे वह अपनी नानी से बात कर रहा है। कभी-कभी अनजान लोगो से अनजाने में इतना गहरा रिश्ता बन जाता है।

दोपहर का वक़्त था पर धुप को बादलो ने छुपा रखा था। बारिश के आने की सम्भावना पूरी-पूरी थी, पर अंकुर का इससे कुछ भी लेना-देना न था। वह पीपल के पेड़ के इर्द-गिर्द दौड़ रहा था, उछल रहा था। बांके भी उसी पेड़ की आघोष में बैठा था।

यूँ उछलते-कुद्द्ते अंकुर की नज़र एक मटके पर पड़ी। छोटा सा मट्टी का एक मटका, ऊपर पेड़ के एक तने से लटक रहा था।

“बांके... बांके...” अंकुर ने पुकार लगायी। “वह देखो... ऊपर... मटका लटका है।“ अपनी बातों से अंकुर का मन स्वयं ही मचल गया और वह हसने लगा। “मटका लटका है!”

“अरे! तुमने वह मटका, आज देखा?” बांके ने पलट कर पूछा।

“क्या होगा उसमे? क्या तुम जानते हो?” अंकुर को जिज्ञासा हुई।

“हाँ... जानता हूँ!” बांके ने मुस्कुराते हुए कहा।

“आओ, मेरे पास बैठो। मैं एक कहानी सुनाता हूँ।“

बांके की यह बात सुन, अंकुर झट-पट बांके से चिपककर बैठ गया।

“कई साल पहले, इधर अकाल आया था।“

“अकाल क्या होता है?”

“ओफ्फो, मुझे पूरी कहानी कहने दो, तुम्हे सब पता चल जायेगा।“

बांके की बात सुन, अंकुर चुप-चाप बैठ गया।

“जब बारिश नहीं होती है, तब जमीन सुख जाता है। तब फसले नहीं होती, तालाब सुख जाता है। पशु, पक्षी, इंसान, हर जीवित प्राणी, धरती पर तड़पता है।”

“सचमे ऐसा होता है।“ अंकुर की नादान आँखों को आश्चर्य हो रहा होता है।“

नजाने क्षितिज से कैसे घनघोर काले बादल आसमान को घेरने लगे थे। यूँ तो अंकुर की दृष्टि उन काले बादलो पर तब नहीं पड़ी। उसका मन, बांके की कहानी में अटका था।

“पहले, ज़माना कुछ और था।“ बांके ने मुस्कुराते हुए कहा। “पहले ज़िन्दगी कुछ और थी, पहले गाँव कुछ और था। पहले भूखमरी, पीड़ा, सब कुछ था यहाँ, बस जीवन में सुकून न था।“

अब अंकुर की नज़र उन् काले बादलो पर पड़ी, और उसे आभास हुआ की उसे अब घर को निकलना चाहिए। पर वह कहानी में खोया था और उससे जाने का मन नहीं कर रहा था।

“पता है, इस पीड़ा से बचने के लिए लोगो ने क्या उपाय लगाए?” बांके मुस्कुराते हुए अंकुर से पूछता है।

अंकुर बांके की और देख मुस्कुराकर ‘नहीं’ बोलता है।

बांके की मुस्कान थोड़ी ओझल हो जाती है। क्षितिज से काले बादलों को यूँ आसमान में फैलता देख जैसे उसे अपना अँधेरा दिखाई देता है। मन भारी हो जाता है, आवाज़ भारी हो जाता है, और उस भारी आवाज़ में, बांके अंकुर से कहता है...

“एक गुणी थे। लोगो का मान, सम्मान, सब उन्हें प्राप्त था। कोई भी दुःख, कोई भी पीड़ा, लोगो को सताती तो वे महज हवन और कीर्तन से कष्ट दूर कर देते थे। जब गाँव के लोगो ने इस अकाल आपदा से बचने की गुहार उस गुणी महासय से की, तब वे इधर, इस ज़मींन का भ्रमण करने आये। मैं तब कुछ नहीं जानता था; मैं तब कुछ नहीं समझता था। लोगो के बकरिया चरा देता था और बदले में लोग मुझे अनाज देते थे। बस, इतना से ही मेरा गुजारा हो जाता था। तब भी यह पीपल का पेड़ था, और आश्चर्य की बात थी, के इस पेड़ पर अकाल के कोई संकेत नहीं दिख रहे थे।“

बांके की आँखों से लहू को बहते हुए अंकुर देख सकता था। चोट गहरी होती है तो आसूं भी धीरे-धीरे गालो में बहती है।

बांके ने अपने हाथों से अपने आसूं पोछे और अपनी कहानी आगे सुनाने लगा।

“मैं इसी पेड़ के निचे सोया करता था। यह पेड़; यह पीपल का पेड़ मुझे दुनिया का हर आराम मोहैया कराता था। मेरा कोई नहीं था। मैं अनाथ था। बस, जो भी था, यह पीपल का पेड़ ही था। इसी से मेरा नाता, इसी से मेरा रिश्ता और इसी से मेरी, गहरी दोस्ती थी।“

“फिर क्या हुआ?” अंकुर के इसी एक सवाल में, बांके पर बीत रही पीड़ा की झलक साफ़ थी।

“वह महासय, जो गाँव भ्रमण करने आया थे, उन्होंने गाँव का हर कोना देखा। वह तो चल ही रहे थे, उनके पीछे लोगो का एक गूठ भी चल रहा था। वह गाँव के तालाब में गए जो सुख चूका था... उसके पीछे लोग भी गाँव के तालाब में गए। वह गाँव के बड़े तबेले में गए... लोग भी गाँव के बड़े तबेले में गए। वह गाँव के खेतो का भ्रमण करने लगे... लोग भी गाँव के खेतो का भ्रमण करने लगे।“

“मेरी दोपहर की नींद बस खुली ही होगी। मैंने उस महासय को दूर से आते हुए देखा।“

बस इतना कह कर, बांके ने चुप्पी साध ली। वह चुप-चाप बैठे, बस आसमान को निहार रहा था।

यह जो पीपल का पेड़ था, बड़ा अद्भुत था। वहा न कोई पंछी, न कोई गिरगिट, न सांप, न तितली, कुछ भी नहीं बैठता था। उसके बड़े-बड़े पत्तो को हवाएं वक़्त-बेवक्त लेह-लाहा दिया करती थी।

“आगे बोलो बांके।“ अंकुर से यह खामोशी बर्दास्त नहीं हुई।

हलकी-हलकी बुँदे आसमानों से गिरने लगी थी। पर अंकुर ने ठान लिया था की अब वह पूरी बात जान कर ही चैन लेगा।

बांके अपनी सोच से बाहर आता है। उसकी मुस्कान अब उसके चेहरे से बाहर हो चुकी है। एक मायूसी ने उस मुस्कान की जगह ले ली है, और अब वह उसी मायूसी और उदासी के साथ अपनी कहानी कहता है...

“पता है अंकुर, महासय सचमे गुणी थे। उसने जो उपाय दिए, फिर कभी इस ज़मीन पर अकाली नहीं आई, कभी भूखमरी नहीं आई, फसले लहरा उठी और हर एक गाँव में, हर्ष-ओ-उल्लास का समा छा गया। मुझे अच्छे से याद है वह दिन। मेरी दोपहर की नींद बस खुली ही थी। मुझे कुछ समझ तो न थी। मैंने बस उन्हें पास आते देखा। उनके पीछे-पीछे लोग भी, भेड़ो की तरह चल-चल कर आ रहे थे। कुछ देर में वह महासय इसी पेड़ के पास आ पहुंचे। भीड़ उधर थोड़ी दुरी में खड़ी हो गयी। उस महासय ने मुझे अच्छे से देखा और फिर इस हरे भरे पीपल के पेड़ का चक्कर काटने लगे। एक चक्कर... दो चक्कर... तीन चक्कर... और बस, मेरे सामने वह खड़ा हो गया। हाथों से उसने इशारा किया तो पांच लोग भीड़ से उठकर मेरे पास आये। बड़ी मासूम सी आवाज़ थी उस महासय की... उस आवाज़ में उन्होंने पूछा, ‘यह बच्चा कोन है।‘

‘अरे... यह पागल है, पहले ने बोला, गाँव का चरैया है, दुसरे ने बोला, अनाथ है, तीसरे ने बोला। उस महासय ने हाथ खड़े कर लिए तो सब चुप हो गए।“

“आँख बंद करके, उस महासय ने किसी को तो याद किया होगा, फिर मुस्कुराकर उसी मासूम सी आवाज़ में मुझसे कहा, ‘बेटा, मुस्कुराओ... मुस्कुराओ क्यूंकि, इस गाँव की, आस-पास के गाँव की, सभी गाँव की दुविधा, तुम साफ़ करोगे... तुम्हे इश्वर ने चुना है।‘

उसके इतना कहते ही उन् पांचो के मन में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी। मुझे देख वे भी बोल पड़े, ‘मुस्कुराओ बेटा, मुस्कुराओ।‘

उस महासय के पास एक पोटली थी। उस पोटली में से उन्होंने एक छोटी मटकी निकाली, फिर एक रस्सी निकाली और एक व्यक्ति से कहा की वह पेड़ में चढ़ कर एक मोटे तने से इस रस्सी को बाँधकर एक फंदा बनाये। दुसरे व्यक्ति को एक और छोटी सी रस्सी पोटली से निकाल कर दी और कहा इस छोटी रस्सी को मटके के मुह में बाँध दे... फिर तीसरे व्यक्ति को पास बुलाया, उसे पोटली में से एक और रस्सी और एक चाक़ू निकाल के दिया। उस महासय ने तीसरे व्यक्ति से कहा के वे मेरे हाथो और पैरो को बाँध दे और मेरा एक ऊँगली काट इस मटके में डाल दे।

मुझे कुछ समज नहीं आया... मैं रोना चाहता था पर उन् लोगो ने मेरे हाथ और पैर बाँध कर बोला, ‘बेटा मुस्कुराओ... मुस्कुराओ बेटा।’ मैंने मुस्कुराया, इस उम्मीद में, के वे मुझे छोड़ देंगे... मैंने अपने हाथो को कसकर मुट्ठी कर ली थी। उन्होंने मेरा हाथ खोला और बोले ‘मुस्कुराओ बेटा... हाथ खोलो और मुस्कुराओ।‘ मैंने उनकी बात मानी, इस उम्मीद में, की वे मुझे छोड़ देंगे। झट से मेरी ऊँगली काट दी उन लोगो ने... मैं दर्द से चिल्लाने लगा। उन्होंने कहा, ‘मत रो, बस मुस्कुराओ...’ मैंने अपने दर्द पर काबू पाया, और मुस्कुराया, इस उम्मीद में, की वे मुझे छोड़ देंगे। फिर उस महासय ने मेरी कटी ऊँगली को मटके में रखा और ऊपर पेड़ के एक मोटे तने में लटकाने बोला। उसके बाद वह मेरी तरफ देख कर बोला, ‘इस बच्चे को सूली पर चढ़ा दो... इसकी मृत्यु ही इन सभी गाँवों के लिए वरदान है।‘

उन सबने मुझे सूली पर टांग दिया। मुझे कुछ पता नहीं चल रहा था, ऐसा क्यों हो रहा है। पर मैंने फिरसे उन्हें एक मुस्कान दी, इस उम्मीद में, की वे मुझे छोड़ देंगे। मेरा दम घुटने लगा, बादल छाने लगी... और जब मेरी आँखे बुझ गयी, तब बारिश आ गयी।“

एक बिजली, तीर के तरह पास के ज़मीन पर गिरी और तेज खड्खाडाते आवाज़ ने अंकुर को अन्दर से हिला दिया। वह डर चूका था। झाँक कर उसने बांके की हाथों को देखा तो पाया, उसके एक हाथ में एक ऊँगली गायब है।

वह झट-पट घर जाने के लिया उठ खड़ा हुआ। तब बांके उसके तरफ देख एक मुस्कान चेहरे पर सजा दी। अंकुर की आँखों में देह्सत था। वह जल्दी घर की ओर जाने लगा।

नहर में पानी उफान पर था। वह पीछे मुड कर देखा तो बांके उसे अब भी मुस्कुराता हुआ निहार रहा था। अंकुर ने हिम्मत कर नहर को पार करने की ठानी। बिच मझदार में पहुँचते ही अंकुर का पैर फिसला। धरा इतनी तेज थी की उसे सँभलने का मौका न मिला, और वह बह गया।

कुदरत एक करिश्मा है जिसके नियम ठोस है, सक्त है और सबके लिए बराबर है। वक़्त-बेवक्त, इंसान कुद्रतो के नियमो से खेलवाड़ करता है और इसकी सजा किसी मासूम को उठानी पड़ती है।

अंकुर नादान था। वह समझ नहीं पाया। अँधेरे रास्तों में चलते हुए उसने खुदको पीपल के पेड़ के सामने पाया। चारो तरफ बंजर ज़मीन थी और दूर तक विराना मौजूद था। उसके सामने पीपल का पेड़ था। बस, उसी में हरियाली छाई थी। अंकुर को समझ नहीं आया वो यहाँ कैसे पहुँच गया। उसने नज़रे चारो और फिराई तब नजाने उसे क्यों ऐसा आभास हुआ, के कोई पेड़ के दुसरे तरफ है। जब उसने झाँक कर देखा तो वहा बांके पेड़ से एक रस्सी के सहारे फ़ासी पर लटका था। अंकुर बांके के पास गया। उसकी ऊँगली कटी थी और खून बूँद- बूँद करके, ज़मीन पर गिर रही थी। बांके की आँखें अंकुर पर ही टिकी थी। अंकुर को उसे देख कर डर सा लग रहा था। बांके उससे देख मुस्कुराने लगा। अंकुर की धड़कने तेज हो गयी। मुस्कुराते हुए बांके ने कहा, “हमारी दोस्ती इतनी गहरी है की अब हम हमेशा के लिए एक हो चुके है।“

यह सुन अंकुर को पशीना आ गया। उसके आँखों से आसूं बहने लगा, बांके की मुस्कान और भी बड़ी हो गयी और तभी, अंकुर आँखे खुल गयी।

वह अपने घर में था... अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। बाहर से कुछ गाँव वालो की और उसके पापा की आवाज़े आ रही थी। अंकुर झट-पट उठ गया। उठकर उसने अपने गालो को छुआ तो उसे आभास हुआ की वह रो रहा था। उसे यह बात थोड़ी अटपटी सी लग रही थी। ऐसा इसीलिए था क्यूंकि उसे समझ नहीं आ रहा था की वह रो क्यों रहा था। उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था की वह यहाँ कैसे पहुंचा।

जब सब धुन्दला सा लगता है तो हर बच्चा अपने माँ को खोजता है। वह भी अपनी माँ को खोजने के लिए बिस्तर से कूद पडा।

दबे पैर चलता हुआ वह अपने माँ के कमरे के दरवाज़े पर खडा हुआ। उसकी माँ सो रही थी। वह अन्दर जाने लगा। उसके कदमो की आहट सुनकर उसकी माँ जाग गयी। उसे अपने तरफ आते हुए वह चोंक गयी और उचे स्वर में उसे पूछा, “तुम कोन हो? और मेरा बेटा अंकुर किधर है?”

यह सुन अंकुर रुक गया। उसे कुछ समझ नहीं आया। बगल में एक आइना था जिसपर अंकुर की नज़र पड़ी। आईने को देख अंकुर घबरा गया। उसे धीरे-धीरे सब याद आने लगा। अंकुर ने आईने को देख अपनी बाजुओं को उठाया, फिर अपना सर पकड़ा, फिर उसने अपना चेहरे को छुआ। आईने पर पड रही परछाई भी ऐसा ही कर रही थी। पहले परछाई ने अपने बाजुओं को उठाया, फिर अपना सर पकड़ा, और अंत में अपना चेहरा। फर्क बस यह था की वह परछाई अंकुर की नहीं थी। वह हुबहू अंकुर की नक़ल जरुर कर रही थी, पर वह परछाई बांके की थी। और बांके मुस्कुरा रहा था।


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