अँधेरे का दिया
By Sushmita Sharma
जगमगाती आतिशबाजियों में,
छिप गया अँधेरा ,
दियों की लौ जलाकर,
स्वागत कर रहे सब नया सवेरा।
हर एक घर,
सितारों की तरह चमक रहा,
हर एक बच्चा,
दिवाली की खुशी में दमक रहा।
झिलमिलाती हुई,
हर एक दुकान,
सबके चेहरों पर खिली हुई,
उत्साह की मुस्कान ।
रश्मिमय हो रही,
हर एक डगर,
दिख रही हर जगह
फुलझड़ियों की लहर।
इतनी दीप्तिमान रोशनी भी,
मिटा नहीं सकती यह अँधेरा,
जब काल ने ही ग्रस लिया,
जीवन पुंज मेरा !
मेरे घर का अंधकार,
अब कौन प्रकाशमान करेगा ?
कौन मिठाई खिलाकर,
सिर पर हाथ फेरेगा ?
किस माँ की पूजा करूँ?
उसने मेरी माँ को बुला लिया !
सन्नाटे की गूँज के साथ,
लिए बैठा हूँ मैं अँधेरे का दिया।
By Sushmita Sharma

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