Zindagi Teri Kitaab Ke
By Shweta Kumari
ज़िंदगी तेरी किताब के ,
पन्ने खुले ही रह गए।
कुछ रिश्तों को बचाने में,
हम तनहा ही रह गए….
हौंसलो के पंख लगा,
उड़ने की चाहत थी दिल की,
पर उनको खुश रखने में,
पंख बंध कर रह गए।
चट्टानों से भी टकरा जाते,
गिर कर भी संभल जाते,
पर ज़िम्मेदारियों की बेड़ियों में,
हम उलझ कर रह गए।
दिल ने देखे थे कुछ सपने,
अरमानों को पूरे करने के,
पर रिश्तों को निभाने में,
हम खाली से रह गए।
रास्ते हमारे मंज़िल तक जाते थे,
उसको पाने का दम भी रखते थे,
पर अपने हिस्से कि छाव लुटाने में,
हम पीछे ही रह गए।
कुछ हजरते हमारी भी थी,
कुछ जाज़बात हमारे भी थे,
पर रूठो को मनाने में ,
हम ठगे से रह गए…...
By Shweta Kumari

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