Zindagi
Updated: Jul 7, 2025
By Sakshi Saxena
ज़िंदगी में हम कितने उलझ गए
कब बैठे थे सुकून से ये हम भूल गए
ज़िंदगी जीने की चाहत में जाने कितने लम्हे हाथों से छूट गए
हर कोई ज़िंदगी की दौड़ में भाग रहा है
जाने क्या वो तलाश रहा है
कोई बीते कल में रुका है
तो कोई अपना आज गवा रहा है
ऐसी भी क्या चाहत मंजिल की
कि सफ़र इंसान बस काट रहा है
रोज़ सुबह एक आशा लेकर उठना
रोज शाम वो निराशा घर लाना
फिर हर रात कल होगा बेहतर इस उम्मीद में सो जाना
कब होगा हमारा ज़िंदगी को खुलके गले लगाना
परेशानियों पर मुस्कुराना
दर्द अपना बतलाना
एक दूसरे का साथ निभाना
कब होगा हमारा ज़िंदगी को खुलके गले लगाना...
By Sakshi Saxena

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