Vo Pita Hai!
By Priyam Gupta
अपनी उलझी सी ज़िन्दगी को, मेरी खिलखिलाहट से सुलझाता है,
न जाने क्यों खुद के लिए लाई हुई चीज़ों को मेरी बताता है।
रोज़ नंगे पाओं चल कर काम पर जाता है,
पर मेरी हथेली में सुबह ही ऑटो का किराया थमा जाता है।
कुछ अजीब सी पसंद है उसकी, मेरी थाली में बची हुई रोटी से खुश हो जाता है।
मेहनत करने का मर्ज़ है शायद, सूरज ढलने के बाद ही घर आता है।
शायद उसका ख्वाब हूँ मैं,
मुझे ख्यालों में ले कर ही सोने जाता है।
कागज़ के टुकड़ों पर अपनी बनाई रंग बिरंगी तसवीरें बड़े शान से दिखाता है,
“क्यों छोड़ दिया?” पूछने पर, मौन हो कर मुस्कुराता है।
उसकी चुप्पी कांच के टूट कर गिरने के शोर से ज़्यादा चुभ जाती है अकसर!
फिर मेरे ही हाथों में मेरी पसंद कि कलम थमाकर,
मेरी लिखी कविता का बखान करवाता है।
भीड़ में मेरा हाथ कस कर थम लेता है, शायद डरता है।
आस्मां में उड़ते बुलबुलों कि तरफ इशारा कर मुझे बताता है,
“तुझे देखकर न मन बुलबुलों जैसा हो जाता है,
एकदम हल्का!”
जो रात को शीत पड़े और शरीर उसका कांप सा जाता है,
वो अपनी रजाई ला कर मुझे ओढ़ा जाता है।
माँ के बीमार होने पर अलार्म का समय थोड़ा पहले का रखवाता है,
टेढ़ी-मेढ़ी रोटियां बना कर वो फिर हमारी ज़िन्दगी चलाने का बीड़ा भी उठाता है।
आज सालों बाद घर आयी तो देहलीज़ पर कदम ज़रा लड़खड़ा सी गयी,
गिरने से पहले भाग कर आज फिर उसने मेरा हाथ थामा है।
आज कद में मैं उससे ऊँची हूँ, वो नज़रें ज़रा उठाकर देखता है,
मुझे खुद से ऊँचा पाकर, मुझसे ज़्यादा वो इतरा उठता है।
उसकी आँखों के आंसू मेरे सपनों के सच होने का फरमान सुनाते हैं,
उसकी पसीने कि खुशबु कि गवाही अकसर मेरी इत्र दे जाती है।
फिरंगी भी है वो, अब अंग्रेजी भी कह जाता है।
मेरे हिंदी को अपने टूटी फूटी अंग्रेजी शब्दों से जोड़कर,
मन ही मन हार्वर्ड कि सैर कर आता है!
कहता है नाज़ है तुझ पर मुझे, बस अब फॉरेन जाना बाकी है,
एइफ्फेल टावर के नीचे बैठकर मुझे सबको तेरी स्ट्रगल स्टोरी सुनानी है।
इक दफा नज़रें उसपर रुक सी जाती हैं,
उसकी मासूमियत कि इबादत में मेरी कुछ बातें मेरे अंदर ही छूट जाती हैं।
नज़राना आज भी था उसके पास और मैं खाली हाथ ही लौटी थी,
पापा के स्नेह के आगे मेरे जीवन भर कि कमाई भी तो छोटी थी।
जानती हूँ,
डाइनिंग टेबल से रसोई तक, उसकी पुकार हूँ मैं।
कोई दूजा उठे या न, उसके सुबह कि अख़बार हूँ मैं।
उसकी मीठे-तीखे मिजाज़ से लोग कहते हैं वो पहेली है,
मैंने किसी को नहीं बताई ये बात पर, वो मेरे गुड्डे-गुड़ियों से खेलने वाली सहेली है।
अब बस करती हूँ, एक पन्ने में उसे कैसे आबाद करूं मैं?
उसकी वाहवाही अनंत है, मेरे और कितने शब्द बर्बाद करूं मैं?
By Priyam Gupta

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