Ummeed
By Harshvardhan Tyagi
ख्वाबो वाली नींदों की खाक जो छाँटी है,
आँखों में आसमां है, मुट्ठी में माटी है.
पहलु में चाँद को सुलाकर जागे हैं,
तेरे कहने पे ऐसे, सारी रात काटी है.
मेरे वाले हिस्से के आँगन में रखी है,
तूने तन्हाई जो टुकड़ो में बांटी है.
तेरे आने की झूठी उम्मीदों का रस,
घूँट-घूँट कड़वी ये चाशनी भी चाटी है.
By Harshvardhan Tyagi

Comments