Ummeed
By Bhagat singh
लगा रखी है
इसने-उससे
उसने-इससे
और अपने-अपने पहलू
अपने-अपने अंदाज में
एक दूसरे को समझने का
जतन करते लोग
पालते जा रहे है
उम्मीद का एक
बनावटी सा ख्वाब
परवाह है
किसको-किसकी भावनाओं की
परवाह, उम्मीद पर किसी के
खरा उतरने की
किसी की उम्मीद पर
कब कोई खरा उतर पाता है
उतरा तो ठीक
अगर ना उतर पाया तो
क्या जिसने उम्मीद लगाई
उसकी गलती है
या जिससे उम्मीद लगाई उसकी
ना तो लगाने वाले की है
ना ही देने वाले की
गलती तो उम्मीद की ही है
जो पनपती रहती है
हर पल हरदम
और देखती रहती है
घुटते हुए पूरे ख्वाबों को
जो चेहरे पर तो मुस्कान ला रहे है
पर अंदर तक चीर कर रख देते है
उम्मीद के दामन को
और तार तार कर देते है॥
उम्मीद के चीथड़ों से अगर
जख्मी ख्वाबों को बांधा जाए तो
कम पड़ जा रहे है चीथड़े
एक और उम्मीद पल रही है
तार-तार होने को
बाकी जख्मों पर उसके
चीथड़े लपेट लेंगे
और फिर से
कोई जख्मी ख्वाब आएगा
सहमा सा
उम्मीद के चंद
चिपटे चीथड़ों का
परचम लहराने॥
By Bhagat singh

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