Tum Dost Bhi Azib Ho Yaar
By Rakesh Singh Sidar
तुम दोस्त भी अजीब हो यार ....
तुम्हे क्या लगता है...कि सिर्फ तुम ही याद करते हो,
हम नहीं.... ।
सिर्फ तुम ही याद कर मुस्कुराते हो,
हम नहीं..... ।
गलतफहमी में जीते हो यार ,
कालेज से TC ले जाने से....क्या कभी कम हो जाता है प्यार
तुम दोस्त भी अजीब हो यार...
कोई कैसे भूल सकता है......स्कूल, कालेज की कहानियों को,
गलियों में दौड़ लगाते,बचपन की नादानियों को
कोई कैसे भूल सकता है....बैंच के उन शोरों को,
चश्में लगाकर class में बैठे उन घोड़ो को ।
कोई कैसे भूल सकता है.....मैदान मार कर बैठे हम निठल्लों को
सिनियरगीरी दिखाते उन आइन्स्टाइन के लल्लो को...
कोई कैसे भूल सकता है....
घर के आँगन जैसा...दोस्तों का ये बाजार
तुम दोस्त भी अजीब से यार....
मन में चाहे कुछ भी है...पर दिल में तेरी सच्चाई है,
राह चलते कितने झगड़े,...पर तू अपना ही भाई है,
राह बदले ..... यार बदले ,पर नही बदला ये याराना ...
अब न जाने किस जनम मिलेगा वह साथ पुराना
व्यस्त रहो तुम, मस्त रहो तुम....जो भी जीवन तुम जीते हो,
जहां चलो ..... चलें कहीं भी जाओ, साथ खड़े तुम ही होते हो
तुम ही माँ की डाट हो..तुम ही पिता की मार,
तुम दोस्त भी अजीब हो यार...!!!
By Rakesh Singh Sidar

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