Sukoon e ilahi
By Jeeshant mathur
Sukoon E Ilahi
जब मौत मिलेगी मुझ से तो मैं मुस्कुरा दूंगा,
जान मांगेगी जब वो मेरी मैं खोखले जिस्म का सिला दूंगा
आंखो का पता तो हमेशा तेरा चेहरा हैं जाना,
ज़ुबान अपनी कही किसी कोने में दफना दूंगा,
यह हड्डियां तो गल रही हैं फिर किस काम कि,
खुदकी चिता पर लकड़ियों के जैसा बिछा दूंगा,
नसों में ख़ू कहा अब तो शराब बहती हैं,
इतनी हैं कि पूरे शहर को निल्हा दूंगा
नकरा ए जोश तेरा तोफा था मुझे इश्क में,
साथ में जामुर्द कि अंगूठी आग में गला दूंगा,
जब चलने लगूंगा भव सागर को पार करने में
तोड़ा सा जोश तेरी कब्र और मेरी कब्र पे गिरा दूंगा
अब कुछ नही बचा पास मेरे मैं खाली हाथ हूं,
वो मांगेंगे मुझ से हिसाब तो मैं उनको क्या दूंगा,
जिन बाहों में तुझे जाना डैम ए सुकून था,
उन्ही बाहों में आखिर में मैं तेरे मालिक को पनाह दूंगा
By Jeeshant mathur

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