Shayariya'n
By Mohammad Imran Khan
मौत आनी है यक़ीनन, अब आ ही जाए l
यूं किश्तों में रोज़-रोज़ अब मरा नहीं जाता ll
मुश्किलें इतनी है ज़िन्दगी में l
जिस दिन ना हो, तो मुश्किल पेश आती है ll
ऐ ख़ुदा ख़ुद-ख़ुशी हराम क्यों की l
मरने के लिए मरे जा रहा हूँ ll
मुझे लोग बुरे वक़्त में याद करते है l
ख़ुदा करे बुरा वक़्त ना आए किसी की ज़िन्दगी में ll
इतना बुरा वक़्त भी आना था मुझ पर l
देखो मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई ll
ढूंढने वाले बता तेरी नज़र क्या ढूंढती है l
ख़ूबियाँ और कमियाँ मुझमें दोनों बेशुमार है ll
काश तुम मुझसे मोहब्बत का सुबूत मांगो l
बदले में मैं अपनी जान देकर तुमको तोहफा पेश करुँ ll
मैं तुमको तुमसे ही मांग कर थक गया l
गर मैं ख़ुदा से मांग लूंगा, तो क्या करोगे ll
माना कि मोहब्बत के काबिल नहीं मैं तुम्हारे l
पर बिना इज़हार किए इंकार कौन करता है ll
मुझे बर्बाद करके जाने वाले शख़्श l
तुझको क्या लगता है तू आबाद रहेगा ll
तुम मेरी ख़राब हालत की गुनहगार हो l
अफ़सोस ये है कि तुम मानते भी नहीं ll
तुम्हारी असलियत तब पता चली l
जब तुम्हारी ज़रूरत ख़त्म हुई ll
काश तुमको मुझसे कोई काम पढ़ जाए l
इसी बहाने ही सही, तुमसे बात हो जाए ll
आएगी तुमको याद मेरी मेरी भी कभी l
ज़रा ख़ुद को अकेला तो होने दो ll
बदनसीब इतना हूँ, कोई दुआ काबिल-ए-कुबूल नहीं l
ख़ुशनसीब इतना हूँ, हर बद्दुआ काबिल-ए-कुबूल है ll
अब तो तुमने ख़्वाबों में भी आना छोड़ दिया l
क्या इतना भी हक़ नहीं रहा मेरा तुम पर ll
वो कहते है दिल में बुग्ज़ नहीं रखते l
तो फिर मुझसे पहले की तरह क्यों नहीं मिलते ll
वक़्त गुज़रता नहीं l
बस गुज़र जाता है ll
By Mohammad Imran Khan

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