Sapne
Updated: Aug 22, 2025
By Dr. Tara Nigam
निराशा के काँटे,चुभते हैं अब इन आँखों में
आँखें भी नहीं मूँदी जाती,न नींद आती है रातों में
रात का घनघोर अँधेरा,मुझे धीरे धीरे निगल रहा है
वक़्त का पहिया तेज़ गति से,मेरे हाथ से निकल रहा है
अब आँखें मूँदने से पहले,करने हैं सब सपने पूरे
ना आएगा चैन फ़लक में,जो रह गए अरमान अधूरे
आशा का एक फूल खिला है,काँटे अब न चुभने दूँगी
हो जाएँ जो सपने पूरे,तो चैन से आँखें मैं मूँद लूँगी
By Dr. Tara Nigam

Comments