Samikaran
By Bhagat Singh
हुई है, आज फिर हुई है
कल की पुनरावृति
कोयल ने सुबह-सुबह
अपनी कहानी सुनाई
गिलहरी फिर कही से
आम की चूसी गुठली उठा लाई
मुरझाई बेल ने फिर मुझसे पानी माँगा
एक कौवे ने फिर से दहलीज को लांघा
आँख मली, बैठा, बैठकर उठा
उठकर खड़ा हुआ
पुनरावृति की घड़ी का काँटा
आगे की ओर बढ़ता हुआ
पीते है, खाते है, सो जाते है
क्या इसलिए सब दुनिया में आते है
क्या एक समीकरण का
अनुसरण करते है सब
दुनिया, दुनिया में लोग
लोगो का समीकरण
किसी के पास `क’ की कमी है
किसी के पास `ख’ सा कुछ खास है
किसी का `ग’ गुमशुदा है
किसी का `घ’ घर से दूर है
अधूरे समीकरण की अधूरी इकाईयाँ
किसी का जन्म होता,किसी के चेहरे पड़ती झुर्रियां
हो सकते है पूरे, शायद हो सकते है
गर हम अपने समीकरण को दूसरे के साथ
समानुपात साझा कर ले
`ख’ का खास `क’ की कमी पूरा कर दे
`ग’ का गुमशुदा `घ’ के घर से दूर वाले को मिल जाए
जिंदगी के समीकरण का अंत शून्य ही है
पर जब तक है
दो समीकरणों को जोड़ते रहे
और सुलझाते रहे, जिंदगी का गणित
पुनरावृति हो रही है, होने दो
जीवन का आधार है, ये पुनरावृति
अनदिखा सा रूपान्तरण हो रहा है
दो जुड़ रहे हे, तीन हो रहे है
जिंदगी की पुनरावृति में
शामिल हो रहे है
होगी शायद, फिर होगी
जो है, जो हुआ, जो होगा
उनकी, उन सब समीकरणों की
पुनरावृति॥
By Bhagat Singh

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