Safar Ya Manzil
By Riya Singla
मंजिल से बेहतर सफर तो नहीं?
हर पल जो लगता एक डर-सा है,
हर पल जो होता एक अजीब एहसास-सा है,
कभी हंसाता है, कभी रुलाता है,
हर बार हारकर गिरकर उठाता है,
जीतने की जो तीव्र इच्छा का समावेश है,
उठ खड़े होने की जो उम्मीद सा-है,
परिश्रम और लगन के जो धागे बुनता है,
आकर्षक सपने दिखा जो रोमांचित करता है,
अच्छे वक्त का जो आनंद दिलाता है,
बुरे वक्त का जो सबक सिखाता है,
आखिर में जो कोशिशों की नदी को मंजिल के समंदर से
मिलाता है,
कहीं सच में मंजिल से बेहतर सफर तो नहीं?
By Riya Singla

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