Sacha Dost
By Pradnesh Tari
कविता - सच्चा दोस्त
लेखक - प्रज्ञेश तारी
दोस्त तो कई है मेरे
सच्चे दोस्त की तलाश थी
दोपहर की कडी धूप मे छाव की तलाश थी
बाते तो होती रहती है कई
गहरी बातो की तलाश थी
सुंने वालो के बीच
समझनेवालों की तलाश थी
थंडी के मौसम मे चादर की तलाश थी
मुस्कुराहट मेरी कभी ना ढल जाये
सच्ची हो या झुटी
कोई ना पकड पाये
मुस्कुराहट में छिपे दर्द को जो तलाशे
ऐसे जोहरी की तलाश थी
बारिश के मौसम मे छाते की तलाश थी
तलाश जारी रही
सच्चे दोस्त को कही पाने की
तभी एक हादसा हुआ
नजाने लोगो को अचानक क्या हुआ
कई लोगोने एक दुसरे को किये text
तो कुछ लोगोंने बरसोबाद किसीको call
सभी को था सबको अपना दोस्त बनाना
मुझसे बात करलो, मुझसे बात करलो
यही था सभीका कहना
बात हो कभी करनी तो बेजिजक बताना
क्या यही थे वह सच्चे दोस्त ?
या इन्सानियत जताने का था बस एक बहाना..
खेर छोडिये
कोई किसी का नही इस दुनिया मे
कहा दिमाग ने दिल से ..
सच्चा दोस्त अगर कही मिल भी जायेगा तो क्या हमेशा तेरा साथ निभायेगा ?
अरे हटा सावन की घटा ..
खुद को ही बना तू मजेदार इतना
की भूल जाये तू किसी और को पाना
मत समज अधुरा तू खुद को
और पहले खुद से तू प्यार कर ले
छोड दे ये तलाश किसी और की
और पहले खुद से तु दोस्ती कर ले
सच्चा दोस्त पाने के तलाश
पहले खुद से तू शुरु कर ले
By Pradnesh Tari

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