Saathi
By Sunil Kumar Shukla
जिन अँधेरों से नफ़रत रही उम्र भर,
आज तनहा सफ़र में वो साथी बने..!
रास आयी नहीं जिनकी सोहबत कभी,
आज वो ही हमारे बराती बने..!!
ऐ ख़ुदा ! पूछता हूँ बता तो ज़रा,
उलझनों के अलावा दिया क्या मुझे..!
बेरहम नफ़रतों की चला आँधियाँ,
रहमतों को मिटाकर मिला क्या तुझे..!
मेरी नज़रों में जिनकी न क़ीमत कोई,
क्यों वही सब मेरे आज थाती बने..!!
जिन अँधेरों से.....!
वो भी हैरान हैं मैं परेशान हूँ,
क्या हुआ है मुझे कुछ पता ही नहीं..!
क्यों मुक़र्रर हुई इस तरह की सज़ा,
जबकि मेरी तो कोई ख़ता ही नहीं..!
साज़िशें बाअसर ख़्वाहिशें दर-ब zzzzss-दर,
वायदे बेअदब बेमियादी बने..!!
जिन अँधेरों से.....!
वक़्त की थोड़ी रफ़्तार कम क्या हुई,
क़ुर्बतें गुर्बतों में बदलने लगीं..!
ख़ूबियाँ जिनका अबतक बहुत शोर था,
ख़ामियाँ बन ख़ज़ाँ में बिखरने लगीं..!
रौशनी आफ़ताबी किताबी बनी,
और जुगनू यहाँ सब मिज़ाज़ी बने..!!
जिन अँधेरों से....!
बेख़ुदी बेबसी बन सिसकने लगी,
ज़ख़्म ज़िन्दा हुए मुस्कुराने लगे..!
आँखें दरिया बनीं टूटते ख़्वाब की,
दर्द सोये सभी गुनगुनाने लगे..!
ख़ैरियत ख़ुद परेशान होने लगी,
हौसले ग़ैर के बेहिसाबी बने..!!
जिन अँधेरों से नफ़रत रही उम्रभर,
आज तनहा सफ़र में वो साथी बने..!!
©सुनील
By Sunil Kumar Shukla

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