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Saath' Ke Aage Ka Saath

Jan 9, 2025
2 min read

Updated: Jan 17, 2025


By Prachi Raghuwanshi


"वो जो कहतेहैंहर सच्ची मोहब्बत मुकम्मल हो, येज़रूरी तो नही ीं,

सच ही तो कहतेहैं।"

ज़रूरी नही ींजजसेतुम चाहो, वो तुम्हेंचाहे।

ज़रूरी नही ींजजसेतुम चुनो, वो तुम्हेंचुने।

क्ोींजक ज़रूरी नही ींतुम्हारी मोहब्बत तुम्हारी होनेके सपनेबुने।

राहुल मेरा सबसेअच्छा दोस्त था।

हम दोनोींभी राहुल और अींजजल की तरह बेहद क़रीब थे,

बस फ़क़़ इतना था जक हमेंबास्के टबॉल मेंनही ीं,

जकताबोींमेंजदलचस्पी थी।

हमारी दोस्ती बास्के टबॉल कोट़मेंनही ीं,

लाइब्रेरी के एक कोनेमेंझलकती थी।

वो जो मैंपढ़ती,

उसकेजलए सुनना सुकू न था।

और जो मैंजलखती,

उसेसमझना उसकेजदल का चैन था।

हमारी दोस्ती जकताबोींके पन्ोींपर चलती कहानी थी।

एक रोज़,

लाइब्रेरी के उसी शाींत कोनेमें,

जब मैंउसेअपनी जलखी कहानी सुना रही थी,

तभी उसके फोन पर एक मेल आया।

वो खुशी सेउछल पडा,

जैसेउसेअपनेसारेजवाब जमल गए होीं।

मेरेपूछनेपर उसनेबताया,

जक उसका ड्र ीम कोस़मेंजसलेक्शन हो गया है।

खुश तो बहुत थी मैं,

पर पता नही ींक्ोींउस वक़्त

थमेहुए जकनारेकी तरह,

उछलती-शोर मचाती लहरोींपर गुस्सा आ रहा था।

पता नही ींक्ोींउस वक़्त

ढलतेसूरज की तरह,


रात के अींधेरेसेजचढ़ हो रही थी।

वो लहरें, वो रात,

राहुल की खुजशयोींकी तरह मुझेबेहद पसींद थी ीं।

पर उस वक्त कु छ टू टा सा महसूस हो रहा था।

वो सब समझ चुका था।

जैसे-जैसेउसके जानेका वक़्त करीब आ रहा था,,

मेरी उलझन और गुस्सा बढ़ता जा रहा था।

जानेके एक जदन पहलेउसनेमुझेजमलनेबुलाया।

और पूछा, "क्ा हुआ है?"

गुस्सा आँखोींसेआँसूबनकर जनकल पडा।

और मैंनेसवाल उसके सामनेरख जदए।

"उन जकताबोींका क्ा जो पढ़नी बाकी हैं?

उन कजवताओींका क्ा जो जलखनी बाकी हैं?"

तब उसनेमेरेआँसूपोींछतेहुए

एक वादा जकया,

"जब लौटू ींगा, तब सारी जकताबेंसुनूींगा।

जब लौटू ींगा, तब हर कजवता समझूींगा।

शहर बदलेगा, साथ नही ीं।"

मैंनेभी मुस्कु राकर उसका वादा लेजलया।

अगलेजदन उसेसी-ऑफ कर जदया।

जफर मैंजकताबेंपढ़ती रही, कजवताएँजलखती रही।

जदन बीते,

मजहनेगुज़रे,

साल खत्म हुआ।

राहुल लौट रहा था।

हम वही जमलनेवालेथे,

जहाँहमनेआखखरी बार अलजवदा कहा था।

मेरा जदल खुश था,

जैसेजकनारा अपनी लहरोींको समेटनेको तैयार हो।

जैसेसूरज अपनी जकरणोींको गलेलगानेको बेताब हो।

मैंनेठान जलया था,


आज उसेबता दूँगी,

जक जजतनी जकताबेंपढ़ी,

उनमेंमैंनेहमारी कहानी खोजी।

जजतनी कजवताएँजलखी ीं,

उनमेंहमारी मोहब्बत रची।

पर बात यहाँखत्म नही ींहोती।

उसकेआनेपर पता चला जक

येलहरेंअपनेसाथ साथी लाई हैं।

येजकरणेंअपनेसाथ खुद की रोशनी लाई हैं।

जजन जकरदारोींमेंमैंने

हम दोनोींको देखा था,

वो अब जकसी और का बन चुका था।

जजन कहाजनयोींमेंमैंने

हमारी दुजनया बुनी थी,

वो जकसी और के नाम साथ सेसजी थी।

हर साथ छू टा सा लगा।

हर वादा झूठा सा लगा।

पर ऐसा तो नही ींथा।

वादा था जक जब लौटेगा

तब हर कहानी सुनेगा।

हर कजवता समझेगा।

शहर बदलेगा, साथ नही ीं।

तो क्ा उन जकरदारोींमें

उसनेखुद को जकसी और के साथ देखा?

तो क्ा मैंने

अपने'साथ' केआगेका साथ देखा?

क्ोींजक ज़रूरी नही ींजजसेतुम चाहो, वो तुम्हेंचाहे।

ज़रूरी नही ींजजसेतुम चुनो, वो तुम्हेंचुने।

क्ोींजक ज़रूरी नही ींतुम्हारी मोहब्बत तुम्हारी होनेके सपनेबुने।


By Prachi Raghuwanshi



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