Qism Qism Ke Jhunjhune
By Aqeel Agaz
विश्व में लोग रोते हुए बच्चों को कैसे बहलाते हैं यह बात कम लोग ही जानते है लेकिन इतनी बात तो सबको पता है कि कशमीर से कन्याकुमारी तक रोते हुए बच्चों को बहलाने के लिए भारतीय माताएं रोते हुए बच्चे के हाथ में झुनझुना पकड़ा कर चुप कराने की तरकीब का इस्तेमाल करती है यह झुनझुने अलग अलग प्रांतों के हिसाब से विभिन्न आकार प्रकार के हो सकते हैं और संभवत: इन्हें अलग अलग नामें से भी जाना जाता होगा लेकिन एक बात बिल्कुल साफ है इन झनझुनों को बजाने व पकड़ाने का केवल एक ही मकसद होता है कुछ समय के लिए बच्चे का ध्यान रोने से हटाना कारण रोने का जो भी हो, झुनझुना बजाकर बहलाने की पद्धति काफी पुरानी है
इसलिए यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं है कि झुनझुनों से बहलना भारतीयों की घुट्टी में शामिल है, चाहे वह किसी जात, धर्म, वर्ग के हों हमारे आपस में लाख मतभेद हो सकते है लेकिन झुनझुनों से बहलने के मामने में हम सब एक हैं। जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है झुनझुनों के आकार प्रकार भी बदलते रहते हैं। स्कूल से कालेज तक उज्जवल भविष्य के लिए पढ़ते बच्चों के हाथ में डिग्री का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है और जो खुशनसीब इसे बजाकर या दिखाकर नौकरी पा जाते हैं, उनके घरवाले अपने लाडले का घर बसाने बाजे गाजे के साथ निकल पड़ते हैं, बाजे वालों की टोली में झुनझुना बजाने वालों को रखा ही इसलिए जाता है कि झुनझुने की आवाज सुनकर दुल्हन ही दहेज का नारा लगाने वाले खुशी खुशी दुल्हन के साथ दहेज भी वर पक्ष के हवाले कर दें. झुनझुने बजाने व पकड़ाने में एक वर्ग विशेष ने आजादी के बाद से अब तक महारत हासिल कर ली है, ग्रामीण विकास की सरकारी घोषणा हो या बढ़ती महंगाई पर अंकुश लगाने की कवायद, बजट के पिटारे से कुछ लोगों को रेवड़िया बांटने का प्रयास हो या गरीब की जेब ढीली कराने की युव्ती हर अवसर के लिए झुनझुने हाजिर हैं, झुनझुनों से बहलने की हमारी मानसिकता का फायदा उठाने के लिए कोई पीछे नहीं है, नेता हो या अफसर या फिर कोई बड़ा उद्योगपति, हमारे हाथ में झूठ सच का झुनझुना पकड़ाकर अपना उल्लू सीधा कर ही लेता है, रही बात गरीबी व गरीब की तो वह तो अपने लिये झुनझुने का बजना ही बड़ी उपलब्धि मान बैठा है इसलिए बहुत पहले किसी शायर ने सच ही कहा था-
तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ
खिलोने देकर बहलाया गया हूँ ..
By Aqeel Agaz

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