Pehli Raat
By Dr MohammadHnaif A Saiyed
हाथों में हाथ ले कर हड्डियों की जमावट महसूस होने लगे तब तक उसे दबाया था मैने । कपड़े बदन से ऐसे उतर गए उस रात, जैसे सारी अहमियत खो चुके हो , जो अहमियत सुबह पहनते वक्त दी थी। गमों को , उदासियों को, और सारे खयालात को उन कपड़ों के साथ कमरे के कोने में डाल कर हम दोनो एक होने की तैयारी में लगे हुए थे । उस रात मैने मेरे होठों पर बनी हल्की सिलवटों का वजूद जाना की जब तुम्हारे होठों को ऐसे चूमा की आज से पहले इसे हमने उसके असल काम के लिए इस्तेमाल ही ना किया हो । गर्दन पे बोसा देने पर हल्की सिसक के साथ बाहों में जोर आ जाना मानो लगा की उंगलियां तुम मेरे बदन में ही घुसा दोगी । हमे मालूम नहीं था इन रास्तों की मंजिल के बारे में जिस पर हम दोनो पहली मर्तबा सफर पर थे ।
ना मै याद आया ना मेरा कोई काम याद आया ।
जब बाहें भर गई सुकून से तुम्हारा नाम याद आया ।।
ये जानो एक ऐसा सफर था जो लग रहा था की खतम ही ना हो । मोहब्बत, इश्क की उन चोटियों पर थे हम, की बादलों में बहने के सिवा दुनिया की एक शय तक याद नही थी ।
अब वो ही बादल बन के बरस रही हो तुम मेरे अंदर ।
उन सारे पलों ने, एहसासों ने मेरे अंदर पत्थर के महल बना कर खुद को संभाल के रखा है उस के अंदर । अबकी जब तुम आओगी तो फिर से वो हाथ पकड़ कर मै उन बादलों में फिर से खो जाना चाहता हु जहां हो तो सिर्फ तुम्हारी रूह, जिसमे मै खो जाऊ और हम दोनो बरस जाए दुनिया की हर वो गली में जहां मोहब्बत के परिंदे हमारे इंतजारमें है ।
By Dr MohammadHnaif A Saiyed

Comments